भगवद गीता — भगवान कृष्ण का शाश्वत गीत
श्रीमद्भगवद्गीता — 18 अध्याय, 700 श्लोक। भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के बीच कुरुक्षेत्र की रणभूमि पर हुआ वह दिव्य संवाद जो आज भी मानवता का मार्गदर्शन करता है।
भगवद गीता — मानवता का सर्वोच्च ग्रंथ
श्रीमद्भगवद्गीता हिंदू धर्म का सबसे पवित्र और महत्वपूर्ण ग्रंथ है। यह महाभारत के भीष्मपर्व का एक भाग है जिसमें भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कुरुक्षेत्र की रणभूमि पर जो उपदेश दिए, वे 18 अध्यायों और 700 श्लोकों में संकलित हैं।
भगवद गीता केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं है — यह जीवन जीने की कला का महाग्रंथ है। इसमें कर्म, भक्ति, ज्ञान और ध्यान के चार मार्गों का वर्णन है। गीता के उपदेश आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने 5000 वर्ष पूर्व थे।
भगवान कृष्ण के पवित्र धाम द्वारका में आकर गीता का अध्ययन करना एक विशेष आध्यात्मिक अनुभव है। हम जल्द ही इस वेबसाइट पर सम्पूर्ण भगवद गीता — संस्कृत श्लोकों के साथ हिंदी अनुवाद और व्याख्या सहित — प्रस्तुत करने जा रहे हैं।
संपूर्ण भगवद गीता — जल्द आ रही है
हम संस्कृत श्लोकों के साथ हिंदी अनुवाद, शब्दार्थ और व्याख्या सहित सम्पूर्ण भगवद गीता तैयार कर रहे हैं। प्रत्येक अध्याय में श्लोक, अर्थ और आध्यात्मिक व्याख्या होगी।
द्वारकाधीश मंदिर देखेंभगवद गीता के 18 अध्याय
प्रत्येक अध्याय का नाम और संक्षिप्त परिचय — विस्तृत सामग्री जल्द आ रही है।
भगवद गीता का महत्व
कर्म का सिद्धांत
गीता का सबसे प्रसिद्ध उपदेश है — "कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।" अर्थात् कर्म करते रहो, फल की चिंता मत करो। यह सिद्धांत जीवन में निराशा और कुंठा से मुक्ति का मार्ग दिखाता है।
आत्मा की अमरता
गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं — "नैनं छिद्रन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।" — आत्मा को कोई शस्त्र नहीं काट सकता, अग्नि नहीं जला सकती। आत्मा अजर-अमर है — यह ज्ञान भय और मृत्यु के भय से मुक्त करता है।
चार मार्ग — चार योग
गीता में मोक्ष के चार मार्ग बताए गए हैं — कर्म योग (कर्म का मार्ग), भक्ति योग (भक्ति का मार्ग), ज्ञान योग (ज्ञान का मार्ग) और राज योग (ध्यान का मार्ग)। प्रत्येक व्यक्ति अपनी प्रकृति के अनुसार किसी भी मार्ग को चुन सकता है।
विराट रूप का दर्शन
ग्यारहवें अध्याय में भगवान कृष्ण ने अर्जुन को अपना विराट (ब्रह्मांडीय) रूप दिखाया। यह गीता का सबसे भव्य और रोमांचक अध्याय है जिसमें ईश्वर की सर्वव्यापकता का वर्णन है।
शरणागति — परम मार्ग
गीता के अंतिम अध्याय में भगवान कृष्ण का सबसे महत्वपूर्ण उपदेश है — "सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।" — सब धर्मों को छोड़कर केवल मेरी शरण आ जा। यह शरणागति का उपदेश भक्ति मार्ग की पराकाष्ठा है।
द्वारका और भगवद गीता का संबंध
भगवद गीता का उपदेश कुरुक्षेत्र की रणभूमि पर दिया गया था। किंतु उपदेश देने वाले भगवान श्रीकृष्ण द्वारका के राजा थे। द्वारका ही उनकी राजधानी थी और यहीं से वे महाभारत के सभी घटनाक्रमों में भाग लेते थे।
इस प्रकार द्वारका भगवान कृष्ण की कर्मभूमि है और गीता उनके जीवन-दर्शन का सार। द्वारका की यात्रा केवल मंदिर-दर्शन नहीं है — यह उस परम चेतना से साक्षात्कार का अवसर है जिसने मानवता को गीता का अमर ज्ञान दिया।
गीता का प्रसिद्ध श्लोक
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।।
— भगवद गीता, अध्याय 4, श्लोक 7
अर्थ: "हे भारत! जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं स्वयं को प्रकट करता हूँ।"
द्वारका की पवित्र यात्रा पर आएं
भगवान कृष्ण के पवित्र धाम द्वारका में आकर उनकी कृपा प्राप्त करें। द्वारकाधीश मंदिर के दर्शन और गोमती घाट की आरती का अनुभव आपकी यात्रा को अविस्मरणीय बना देगा।
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